Wednesday, July 31, 2019

ब्लैकमेल


 ब्लैकमेल




ब्लैकमेल एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसके कहानीका कोई न कोई हिस्सा हमारे जीवन के साथ जुडा हुआ है। सन 2018  के सितम्बर अक्तुबर में सोशल मिडिआ का गलत इस्तेमाल करके कुछ औरतोंने कामयाब पुरुषोंके उपर लांछन लगाने की प्रक्रिया कि तो समझ मे आया कि
 पुरुष हमेशा लिंग पिसाट होता है, और स्त्री बेचारी अबला और अपना यौनशुचित्व सम्भालनी वाली, बिना किसी मानसिक विकृतियोंकी होती है।

इस प्रकार का चित्रण होता है, उसे कहीं ना कहीं अलग आयाम से देखने की जरूरत महसूस हुयी। 

स्त्री की मनो लैंगिक मानसिकता और वैवाहीक जीवन स्वास्थ्य पर उसका होने वाला असर इन विषयोंको मनोरंजक ग़्हंग से यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

कहाँनी का समय काल अस्सी के दशक के                                                                              
उत्तरार्ध से लेकर नब्बे का सम्पूर्ण दशक  उसके पश्चात सन  के सितम्बर तक का है।

इसके दरमियान तांत्रग्यानिक बदलावोंके संदर्भ बीच बीच में आते है, जो कहाँनी को उस समय मे लेकर जाते है।
केवल इतना ही नहीं,किसानोंकी आत्महत्या और उसकी तरफ देखने का सरकार का नजरिया
 
 इसका चित्रण अत्यंत भयावह रीती से किया गया है। केवल चित्रण ही नहीं जनमानस का इस समस्या को सुलझाने का प्रयास भी दर्शाया गया है।

रोज के पति पत्नी के उत्कट वैवाहीक जीवन का चित्रण लैंगिक आरोग्य की चर्चा करता है। 

लेकिन कहीं पर भी यह चर्चा अश्लील नही होती।
व भारतीय संस्कृती में दैनंदिन पति-पत्नी के
व्यतिगत जीवन विषय को समाज के सामने रखना एक साहसीक कार्य है।
उसमें लेखक कामयाब हुआ है। समाज का एक अभिन्न हिस्सा और समस्या वेश्यावृत्तिइसपर भी मार्मिक वर्णन यहाँ पर किया गया है।जो लेखक की प्रगल्भता को दर्शाता है। 

केवल वर्णनात्मक शैली में ना रुकते हुये लेखक यहाँ पर दार्शनीक हो जाता है।

आम तौर पर समाज की एक धारणा है, कि मुम्बई जैसा शहर एक दूसरे की परवाह ना करते हुये कट थ्रोट कम्पिटिशन में लगा है।
जहाँ पर वास्तविकता में ऐसा नहीं है। सामान्य नागरिक एक दूसरे की मदद मुम्बई में बहोत ज्यादा करते है, इसीलिये यहाँ के लोगोंकी छोटे बडे धंदे में तरक्की होती है। यहाँ पर एक विशिष्ट वर्क कल्चर काम करता है।
शायद यही वजह है, कि जो इंसान एक बार मुम्बई आ जाता है, तो यहीं पर बस जाता है।

एक दूसरे की मदद के सुंदर नजारे दो वक्त देखने के लिये मिले थे, पहला, जब मुम्बईके लोकल
   
ट्रेनोंमे बम धमाके हुये थे और दूसरा जब मुम्बई में सैलाब आया था।

कहींपर भी मुसीबत में फसी औरतें बच्चोंका किसीने ना जायज फायदा नहीं उठाया| उस वक्त एक भी एफ आई आर पुलिस के पास दर्ज नहीं हुयी। दूसरे ही दिन यह शहर फिर से दौडने लगा था।

मूल व्यक्ति रेखा को दूसरे की मदद मिलना और स्वयम दूसरे की मदद करना यह इसी मानसिकता को दर्शाता है।
बहोत कम शब्दों में पत्नी के माँ बनने की प्रक्रिया में पति का व्यक्तिगत सेक्स लाईफ कैसे होता है,

इसका वर्णन काबिले तारीफ है।

भारतीय समाज एक आदर्शवाद की बुनियाद पर     
खडा था। लेकिन अस्सी के दशक के बाद क्योँ और कैसे समाज माँनस और व्यक्तिगत तौर पर बदलाव आते गये इसका लेखक के द्वारा किया गया सामाजिक, वैश्विक और राजकीय विश्लेषण नयी सोच दे देता है।

विशिष्ट व्यक्तिरेखाओंके साथ इस कहाँनी के नरेशनकी स्टाईल इतनी रफ्तार भरी है, की वाचकोंको कही ठहरने का मौका नहीं मिलता।

भाषा शैली अत्यंत सदगीभरी होने के कारण सामान्य वाचक को महसूस होता है, कि यह घटनाये उसके जीवन में ही घटीतहो रही है। अति अलंकृत या कठीन शब्दोंका प्रयोग इसमें जानबूझकर नहीं किया गया है। 
     
इस कहाँनी के किरदार और घटनाओंको इस कदर पिरोया गया है, कि आगे चलकर इसका रुपांतरण फिल्म, नाटक या टी.वी. सीरीयल में हो। इसलिये पात्रोंकी मानसिकता सम्वादोंके द्वारा ज्यादा हुयी है।   

यह कहाँनी उन सभी लोगोंके लिये प्रेरणा का स्त्रोत है, जो शून्य से बिजनस शुरू करना चाहते है, और कामयाब होना चाहते है।यह कहाँनी आपके वैवाहीक जीवन में अमुलाग्र परिवर्तन लायेगी और जीवन समृद्ध बनायेगी ।

ऐसा लेखक का दावा है; जो की सच है। इसके पीछे कुछ राज है।

लेखक स्वयम एक मानस शास्त्र तज्ज्ञ है। हजारो लोगोंके जीवनको सकारात्मक रीती से उन्होने परिवर्तित किया है।

स्वयं चित्रकार होने की वजह से इस किताब मे जितने भी चित्र है, उंहोने खुद ही अंकित किये हुये है।

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