Thursday, July 11, 2019

स्पोकन इंग्लिश वाया हिंदी

स्पोकन इंग्लिश वाया हिंदी

image od spoken english book
स्पोकन इंग्लिश वाया  हिंदी 


इं ग्लिश स्पीकिंग की दुनिया में इतनी सारी किताबें है तो फिर यह और एक किताब क्यों?

यह इसके लिए हैं क्योंकि हमने, बाजार में स्लो, फास्ट या “रेपिडली” सिखाने का दावा करने वाली किताबोंका अध्ययन किया और यह पाया कि यह किताबें अंग्रेजी बोलना शायद सिखाती भी होगी..


लेकिन इन किताबों से जिंदगी के लिए मिलने वाला ज्ञान बहुत ही नकारात्मक है।

लगने लगता है, जैसे उनके लेखक जिंदगी से ऊब चुके हैं। जिंदगी से हार चुके है,  इसलिए केवल बालबोध स्कूल टीचर के जैसे उन्होने जैसे तैसे किताब लिखकर छोडी है। पढ़ने वाले को भी मजा नहीं आ रहा है।

दूसरा कारण यह है कि यह “रेपिडली” सिखाने का दावा करनेवाली किताबे मनोरंजक नहीं है।

पाँचवी कक्षा के भूगोल गणित के जैसे यह भी एक बेजान टेक्स्ट बुक जैसे रसहीन किताब हो जाती है।

तीसरा कारण यह है कि भाषा सिखाने के लिए यह
लोग सबसे पहले व्याकरण सिखाने की कोशिश करते हैं। उनकी सबसे बड़ी गलती यही है।

याद कीजिए कि हम अपनी मातृभाषा, हमारे बचपन में कैसे सीखे थे? क्या हमें अपनी माँ ने सबसे पहले हमें व्याकरण सिखाया था?

बिल्कुल नहीं !
सबसे पहले हमने शब्द और व्यक्ति या वस्तु इनका संबंध पहचाना। उदाहरण के लिए सबसे पहले हम माँ या मम्मी बोलना सीखे थे।

उसके बाद आकारांत शब्द सीखे। जैसे कि मामा, दादा, बाबा ई. यह सीखने के बाद हम पानी, रोटी इत्यादि बोलना सीखे।

शायद तभी हमारी खुद की अलग डिक्शनरी अलग शब्द संग्रह था हम रोटी को रोटी नहीं, ता ता ता... या ना ना ना...

ऐसे ही कुछ कहते थे। तो तभी हमारी माँ क्या हमें व्याकरण के नियम सिखाती थी? नहीं!
बाद में हमें प्रशिक्षण मिला, घर में रखी हुई चीजों को पहचानने का। फिर उसके बाद हम अड़ोस पड़ोस की चीजों को जानने लगे, पहचान कर बोलने लगे। उसके बाद हम स्कूल गए। फिर धीरे-धीरे व्यवहार फिर.... व्याकरण!
अब इंग्लिश सिखानेवाले लोग इससे बिल्कुल उल्टा कर देते हैं।

वह सबसे पहले आपको व्याकरण सिखाने की कोशिश करते हैं।

फिर तुरंत व्यवहार की बातें सिखाते हैं। और अगर इंग्लिश में बोलते वक्त आप छोटी-छोटी गलतियां कर देते हैं तो उनकी कुत्सित हंसी उनके चेहरे पर छा जाती है। जिसे हम पहचान भी पाते हैं।


हमने मानवी जनसमुदाय के भाषिक आदान प्रदान का गहरा अध्ययन किया।तो हमें कुछ दिलचस्प बातें पता चली।

किसी भी भाषा के साधारणत: कितने वाक्य हम रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल करते हैं?
यह जानकर आपको हैरानी होगी कि ...

हम ज्यादा से ज्यादा तीस चालीस वाक्य ही मूल रूप से बोलते हैं।  

बाद में उन वाक्यों में सिर्फ नाम बदलता रहता है। इन वाक्यों में इस्तेमाल होने वाले किमान शब्द कितने हैं?  ज्यादा से ज्यादा डेढ़ सौ दो सौ... बस!

 
सिर्फ चालिस वाक्यों को हमने याद रखा तो हम अंग्रेजी भाषा को सीख सकते हैं।

अंग्रेजी भाषा बोलना सीखते वक्त शुरुआत में ही व्याकरण सीखने की कोशिश ना करें। आपने अपनी मातृभाषा का व्याकरण कभी पढ़ा था? याद कीजिए.. शायद पाँचवीं या छठी कक्षा में। तब आपकी उम्र क्या थी? करीब दस ग्यारा साल।
और आपने भाषा सीखना कभी शुरू किया था? करीब डेढ दो साल की उम्र में। तो साधारणत: आठ नौ साल तक आप बोलते रहे, लिखते रहे, पढ़ते रहे। फिर कहीं जाकर आप व्याकरण का अभ्यास करने लगे।

मान लीजिए अगर माँ नें आपके दो साल की उम्र में ही आपको व्याकरण सिखाना शुरू किया होता था, तो क्या होता था?

    
व्याकरण के डर के मारे अब तक आप बोल ही नहीं पाते थे।

अब हम अंग्रेजी सीखने के लिए भी यही नेचुरल फार्मूला अपनाएंगे। और निसर्गत: अंग्रेजी बोलना सीखेंगे।

हम शुरुआत में ही व्याकरण नहीं सीखेंगे।
गलतियाँ होने दीजिये। गलती से डरिये नहीं। बिलकुल एक बच्चे की तरह।  

आत्मविश्वास बढाने के लिय एकदम घरेलू बातें सीखेंगे। घर में हम तीन चार वाक्य ही बार बार दोहराते हैं।

घर में बार बार पूछे जानेवाला एक सवाल है।

मेरा मोबाइल कहाँ है?

 
फिर मोबाइल के अलावा हम, पेन, रुमाल, घड़ी, पैसे, जूते, चाबी कुछ भी पूछते हैं। देखने जाए तो मोबाइल यह नाम है।

वस्तुओं का संबोधन (प्रॉपर नाउन) किसी भी भाषा में वही रहता है।

अब हम इसे अंग्रेजी में दोहराएंगे, तो कैसे वाक्य बनाएंगे?
वेयर इज माय मोबाइल? (अब मजा यहीं से शुरू होगा।)

वेयर इज़ माय पेन’?
वेयर इज माय वॉच’?
वेयर इज माय की’?
 
ऐसे यह वाक्य बनते हैं। जिनमें वेयर इज वैसा ही रहता है। सिर्फ चीजों के नाम बदलते रहते हैं। है ना कितना आसान!

बोलते वक्त आपने माँ से ऐसे पूछा, वेयर इज माय शूज” तो क्या माँ जूते कहाँ है ये नहीं बताएगी क्या? जरुर बताएगी। अब सनातन व्याकरण के हिसाब से यह पूछना चाहिए वेयर आर माय शूज’…

और एक मजेदार बात हम आपको बताना चाहेंगे। हम भारतीय लोग, शुद्ध अंग्रेजी बोलते ही नहीं। हम हमेशा भाषांतरित अंग्रेजी बोलते हैं।
लेकिन हमारा काम चल जाता है। घर पर आए हुए मेहमानों से हम पूछते हैं, क्या आप चाय पीएंगे?’ तो यही बात हम अंग्रेजी में पूछते हैं, डू यू ड्रिंक टी?’
यह व्याकरण के हिसाब से गलत है। यहाँ पर होना चाहिए, “वुड यू लाइक टू हेव सम टी
 
अब दूसरा मजेदार उदाहरण लेंगे.. बारिश गिर रही है इसको हम अंग्रेजी में कैसे कहेंगे.. रेन इज फॉलिंग’.. यह गलत है, यहाँ पर होना चाहिए, “इट्स रेनिंग”
लेकिन हम अगर व्याकरण के हिसाब से नहीं बोले तो सामने वाला समझा नहीं क्या? या बारिश ने गिरने का काम छोड़ दिया क्या?....  कम्युनिकेशन जरूरी है।

डरिए मत। व्याकरण के महारथी आपको डराएंगे। वह आपके मन में अंग्रेजी बोलने के प्रति भय निर्माण करेंगे। क्योंकि बड़े बड़े अफसर लोगों को हमने देखा है वह अंग्रेजी पढ़ना लिखना जानते हैं लेकिन बोल नहीं पाते।

वो “ग्रामर फोबिया” के शिकार होते है। (फोबिया मतलब काल्पनिक डर।)
 
अंग्रेजी बोलते वक्त हमारे मन में अजीब सा डर पैदा हो जाता है। गलती होने का डर। लोग हमें हसेंगे यह डर। यह डर हमारे मन में कहाँ से आया?

इसके उपर हमने रिसर्च किया तो चौकानेवाले तथ्य समझ में आये। इस फोबिया को समझने के लिये अब हम यहाँ थोड़े मानसिक विश्लेषण में जाएंगे।

जब हम पाँचवी सातवीं के विद्यार्थी थे तब हमें हमारी मातृभाषा का व्याकरण सिखाया जा रहा था। और ठीक उसी वक्त हमें अंग्रेजी भाषा उसके व्याकरण के साथ पढ़ाई जा रही थी। जो हमारे दिमाग के ऊपर से जा रहा था।

तब मास्टर जी से लेकर सभी बच्चोंने, सब ने हमारी अंग्रेजी का मजाक उड़ाया था।   
तब से व्याकरण का यह डर हमारे जहन में बैठ गया है।

ठीक उसी डॉक्टर के सुई जैसा। जिससे बड़े-बड़े तीस मार खाँ डर जाते हैं।
डॉक्टर की सुई कितना दर्द पैदा करती है? मात्र चींटी के काटने पर जितना होता है, उतना। और हम कितना दर्द सहने की हिम्मत रखते हैं? अगर हमारा हाथ या पैर टूट जाए तो भी हम उसे सहेंगे। फिर इतने डेअरिंगबाज व्यक्ति में सुई के प्रति भय कहाँ से आया? ....

हमारे बचपन से। बचपन में जब हम रोते थे किसी चीज के लिए जिद करते थे और किसी की नहीं सुनते थे, तब हमारी नानी या दादी हमसे कहती थी, आने दो डॉक्टर को, तुम को एक सुई लगाएंगे। फिर तुम्हें बहुत दर्द होगा 
 
फिर क्या है दादी या नानी की यह बात हमारे जहन में यू रेकोर्ड हो जाती है कि जिंदगी भर हम इंजेक्शन से डरते रहते हैं।
यही होता है हमारी अंग्रेजी की पढ़ाई के साथ।

गलती है एजुकेशनल सिस्टम की लेकिन सजा हमें भुगतनी पड़ती है।

खैर चलिए कोई बात नहीं अभी हम उसी डर को हटाने का काम कर रहे हैं।
हमारे संशोधन से हमें पता चला कि असल में किसी भी बोली-भाषा का व्याकरण होता ही नहीं।

अगर आप गौर करेंगे तो ग्रामीण भारत में जो भी भाषा बोली जाती है उस हर एक भाषामें गालियां भी होती है।

 
उसमें उल्टे पुल्टे शब्दों के पुंज भी रहेंगे जिसे मुँहावरे या कहावत कहते है।
उस भाषा को शहर वासी लोग शायद नीचे की स्तर पर देखते है।
भाषा यह कम्युनिकेशन का केवल एक माध्यम है। हम यहाँ यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि यदि हमने व्याकरण के नियमों का पालन बोलते वक्त नहीं किया तो क्या होगा?

मान लीजिए बोलते वक्त आपने कहा, “वेयर इज माय चश्मा”? तो क्या यह गलत भाषा है? बिल्कुल नहीं!

अब हमारी मातृभाषा में आप (समाज) साठ प्रतिशत अंग्रेजी शब्द घुसेड चुके हो, तो अब अंग्रेजी बोलते वक्त हमारे अपने शब्द आए तो क्या कोई बहुत बड़ा पाप हुआ? बिल्कुल नहीं!
   
लेकिन कम कॉन्फिडेंस वाले लोग ऐसी अंग्रेजी बोलने पर खुद ही शर्माएंगे। या स्वयम घोषित अंग्रेजीके पण्डित आप पर हसेंगे।
फिर कभी भी जिंदगी में आप अंग्रेजी बोलने की कोशिश भी नहीं कर पायेंगे। अब वक्त आ गया है कि हम अंग्रेजी पर हुकूमत करें।

इस कम्प्यूटर युग में हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जहाँ अंग्रेजी बोलना, जानना अनिवार्य हो गया है।

संपूर्ण विश्व का मानो संगणकीकरण हो रहा है। संपूर्ण विश्व छोटा हो रहा है। कम्युनिकेशन के साधनों में तेजी से उन्नति हो रही है।

पिछले पचास सालों में मानवीय मस्तिष्क काफी उन्नत हो गया है।  
 
मानव समाज की विचारधारा अपने कोषोंसे निकलकर काफी उन्नत हो रही है। इसलिए पूरी दुनिया में एक अजीब बात हो रही है कि पूरा मानव समूह एक ही भाषा में बात करने लगा है। यह एक प्राकृतिक चमत्कार है।

समूचे विश्व के कौवे कांव-कांव करते हैं। बिल्लीयाँ म्याँव म्याँव करती हैं। किसी भी प्रांत या देश के प्राणियोंके प्रजाती का भाषा उच्चारण और संदेश एक ही जैसे होता है।

प्राणियोंकी भाषा वैश्विक होती है।

उदाहरणार्थ भारत देश के बिल्लियोंको अमेरिका में लेकर गए तो अमेरिका की बिल्लीयाँ भारतीय बिल्लीयोंकी भाषा समझ पायेंगी। उनके कम्युनिकेशन में कुछ फर्क नहीं पड़ता।     
 
मानव समूह केवल एक ऐसी प्रजाति है जिन्होंने अपने अपने भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल अपनी अपनी भाषाएँ निर्माण की।

यहाँ तक तो ठीक था लेकिन प्रांत वाद के आक्रमणकारियों ने अपने श्रेष्ठत्त्व को जताने के लिए भाषा को ही माध्यम बना दिया। मेरी भाषा श्रेष्ठ तुम्हारी भाषा कनिष्ठ, ऐसा भेदभाव निर्माण किया। लेकिन अब बहुत बड़ा बदलाव आ रहा है।

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि पूरे विश्व भर से करीब करीब साढे चार हजार से भी ज्यादा (बोली) भाषाएँ लुप्त हो गई है।

उदाहरण के तौर पर पाली, मागधी अर्धमागधी (थोड़ी बहुत संस्कृत भी) इत्यादि।  

 
भारत देश की प्रमुख बाईस  भाषाओं पर हम नजर डालें तो आपको यहाँ दिखाई देगा कि यह सब प्रांतिक भाषाएं नागरी और ग्रामीण ऐसे दो हिस्सों में बटी हुई है।

 जहाँ ग्रामीण भाषा धीरे धीरे नागरी भाषा में विलीन हो रही है। और नागरी भाषा इंग्लिश में विलीन हो रही है।
हमारे महानगरों में पिछले बीस सालों में स्कूलों के पढ़ाई के माध्यमों में एक जबरदस्त परिवर्तन आया है|

हर विद्यार्थी के पढ़ने का माध्यम इंग्लिश हो रहा है| यह बदलाव इतना तेज है कि अब अठराह साल के अंदर की युवा पीढ़ी अपनी अपनी मातृभाषा बोल सकती है। लेकिन उसे लिख नहीं सकती।

अपनी अपनी मातृभाषा लिखने वाली हमारी (चालीस प्लस की उम्रवाले) यह आखिरी पीढ़ी है।   
 
आने वाले सौ सालों में हमारी मातृभाषा भी लुप्त हो जाएगी और इंग्लिश भाषा को हम विश्व भर में पाएंगे।

इस विश्लेषण के बाद हमें विचलित होने की कोई जरूरत नहीं है।
हम खुद इस परिवर्तन का एक अहम हिस्सा भी रह चुके हैं। शायद आप दसवीं बारहवीं तक पढ़े हो तो इस मुद्दे को आप आसानी से समझ पाएंगे।

अपनी मातृभाषा की किताब में हमें अक्सर सौ साल पुराने कुछ पाठ रहते हैं। कुछ संत कबीर के दोहे रहते हैं। फिर पचास साल पुरानी क्लासिकल कथाएं रहती है और मॉडर्न कथाएं भी रहती है।

उनपर जब आप नजर डालोगे तो समझ पाएंगे कि हमारी मातृभाषा में भी कितना सारा बदलाव आया है।
 
पाठशाला में सिखाई जाने वाली भाषा और हमारी बोली भाषा इनमें फर्क तो देखिए।
कितने सारे इंग्लिश शब्द हम इस्तेमाल करने लगे हैं। यह एक प्राकृतिक बदलाव है।
पॉलीटिकल नेता गण इसे पश्चिमी आक्रमण कहते हैं। लेकिन समाजशास्त्र विचारक इसे मानव समाज के उत्थान की प्रक्रिया मानते हैं।

क्या हम शर्ट पैंट नहीं पहनते हैं? बिलकुल आदिवासी लोग भी शर्ट पेण्ट पहनते है। कहाँ गए हमारे वह धोती, कुर्ता, पजामा?

यह पश्चिमी आक्रमण नही सम्पुर्ण मानव समाज में आया परिवर्तन है। इससे कम से कम इतना तो अच्छा  

 
हुआ कि पहनावे को लेकर हमारे जितने भेदभाव थे उनको हम भूल चुके हैं।

क्या हम हर रोज सुबह को उठकर चाय नहीं पीते हैं? क्या हम बटाटा के व्यंजन नहीं खाते हैं? क्या हम आज मनोरंजन के लिए पूर्णत: टेलीविजन पर निर्भर नहीं है? यह सब चीजें पश्चिमी देशों की देन हैं। जो अच्छा है उसे स्वीकारना यह सहज मानवीय प्रवृत्ति है।

यह सामाजिक विश्लेषण यहाँ देने का विशेष कारण है। अगर अंग्रेजी भाषा सीखने का विरोध हमारे परिवार में हैं या हमारे यार दोस्तों का विरोध है तो हम लाख  किताबे पढें, उसके बावजूद भी हम इंग्लिश नहीं बोल पाएंगे।

क्योंकि भाषा सीखना, बोलना यह एक सामूहिक प्रयास होता है।
 
जिस परिवार में हम रहते हैं, जो लोग हमारे आजू-बाजू में रहते हैं उन्होंने अगर हमारे इंग्लिश स्पीकिंग के प्रयत्नों की सराहना नहीं की; या हमारे साथ उन लोगों ने भी इंग्लिश बोलने का प्रयास नहीं किया तो आप जल्दी इंग्लिश नहीं बोल पाएंगे।

अगर आपके दोस्त, आपके परिवारवाले आप का मजाक उड़ाएंगे तो आप इंग्लिश कभी बोल नहीं पाएंगे। और अगर हमारे परिजन, मित्र अंग्रेजी बोलने का प्रयास कर रहे हैं तो हमें भी उनका हौसला बढ़ाना चाहिए।

हम वही भाषा बोल सकते हैं जिसे हम बार-बार सुनते हैं।

इसलिए जरूरी है कि हम इंग्लिश न्यूज़ या इंग्लिश फिल्में देखें।

    
 पुराने खयालात के लोग इंग्लिश सिनेमा को गंदा समझते हैं लेकिन जेम्स बॉन्ड, रॉकी, रैंबो जैसी फिल्में, जैकी चैन की फिल्में देखने लायक होती है।

कितनी सारी नई हिंदी फिल्में परिवार के साथ देखने लायक भी नहीं होती। स्पोकन इंग्लिश सीडी सुनना भी अच्छा अभ्यास है।
अपना शब्द संग्रह बढ़ाने के लिए पढ़ना जरूरी है। जिस किसी मे आपको रुचि है, आप जरूर पढ़िए।

न्यूज़ पेपर, कॉमिक्स कुछ भी पढिये। क्योंकि हमें इंग्लिश के वाक्य बनाना आना चाहिए।

अनेक लोगों की तकलीफ यह है कि वह इंग्लिश समझते हैं पर बोल नहीं पाते।यह इसके लिए होता है क्योंकि वह कभी बोलने का प्रयास ही नहीं करते।  
सही या गलत की फिक्र छोड़ दीजिए। बोलते रहिए बोलते रहिए।

कामयाबी के लिए तीन चीजें बहुत जरूरी है। पहली है प्रैक्टिस दूसरी है प्रैक्टिस और तीसरी है प्रैक्टिस। प्रैक्टिस मेक्स द मैंन परफेक्ट!


***********************










व्याकरण और बदलते स्पेलिंग




 
 



वि  श्वभर में अंग्रेजी बोलना सिखानेवाले क्लास में लोग स्पेलिंग के ऊपर जरूरत से ज्यादा ही जोर डालते हैं। और छोटी छोटी गलतियाँ कितना भयंकर बदलाव कर सकती है इत्यादि कि वह चर्चा करके आप को डराते रहते हैं। फिर इस पुस्तक में हमने स्पेलिंग को क्यों महत्व नहीं दिया है?

हमने तो उल्टा अंग्रेजी उच्चारोंको भी रोमन लिपीके बजाय देवनागरी लिपि में ही लिखा हुआ है। क्या भूमिका है हमारी इसके पीछे?

इसका एक कारण है, लिखते वक्त स्पेलिंगकी आवश्यकता रहती है। लेकिन बोलते वक्त केवल उच्चारण ही जानना जरूरी होता है। अन्यथा रोमन लिपी में लिखा हुआ अक्षर समझने मे और उर्जा खत्म हो जायेगी। और मुख्य उद्देश्य से हम भटक जायेंगे।
दूसरा कारण है, बदलाव! अंग्रेजी भाषा अंग्रेजों की देन है। जो बाद में अमेरिकन उपखंड में फैल गई। उसके पश्चात, यूरोपीय उपखंड और फिर उसके पश्चात भारतीय उपखंड में धीरे-धीरे फैलती गई।

युरोपियन देशोंमें उनकी स्थानिक भाषाएँ हजारों सालों से अस्तित्व में थी। अंग्रेजी भाषा नहीं थी।
भारत देश में गुजराती, अवधी, मराठी, बंगाली इस प्रकार की हजारों अलग-अलग प्रांतिक भाषाएँ हैं। भाषाओंके अनुसार अलग अलग राज्य भी हैं। इन अलग-अलग राज्यों को एक ही अनुशासन में, केंद्र के सरकार के अधीन रखा गया है। लेकिन मान लीजिए
कि हर एक राज्य अलग होकर अपने आप को अगर स्वतंत्र देश घोषित करें; तो किस प्रकार की स्थिति पैदा हो जाएगी? बस उसी प्रकार की स्थिति यूरोपीय उपखंड में है। जहाँ पर कई यूरोपीय देश तो अपने राज्यों से एवं अपने शहरों से भी छोटे हैं।
दूसरे विश्व महायुद्ध के दरमियान युद्धभूमि रही यूरोप। जर्मनी, इटली, स्वीडन वैगेरे देशों से लोगों ने अमेरिकन उपखंड में स्थलांतर किया। उन लोगोंको अंग्रेजी भाषा की स्पेलिंग समझ में आना मुश्किल था।
क्योंकि रोमन लिपि में लिखे जाने वाली यह भाषा लैटिन और अन्य भाषाओं से प्रेरित थी। पूरे विश्व भर में भाषाओं का जो विकास हुआ उन में लिखना और बोलना दोनों का विकास जैसे के तैसे ही हुआ।

मतलब जैसे बोलते हैं वैसे ही उसे लिखा जाता है। या जैसे लिखा है उसे वैसे ही पढा और बोला जाता है। लेकिन अंग्रेजी का ऐसा नहीं है। उदाहरणार्थ सी अक्षर
 लिया जाए तो कहीं पर वह कैट कहीं पर कोट हो जाएगा। कहीं पर सीझर तो कहीं पर डिसंट, कहीं पर सस्पिशियस तो कहीं पर चॉकलेट बन जाता है।

इस उलझन को सुलझाने के लिए महान लेखक मार्क क्वीन एवं महान नाटककार जॉर्ज बर्नार्ड शा इन्होंने “क” के लिए अंग्रेजी वर्णाक्षर “के”, “ग” के लिए “जी” “ज”  के लिए “जे” इत्यादि प्रकार के अंग्रेजी को उच्चारण के नजदीक स्पेलिंग्ज लाने की कोशिश की। परंतु उन दोनों के मृत्युके पश्चात उनका कार्य सीमित रह गया।

अब इक्कीसवी सदी में जब कंप्यूटर और मोबाइल आ गए हैं तो और एक बार तेजी से अंग्रेजी लिखने में बदलाव आ गया है।
यह बदलाव एस.एम.एस. के जरिए आया है। यह शॉर्ट मेसेज टाइप करने के लिए सिर्फ और सिर्फ उच्चारण जैसे ही स्पेलिंग टाइप की जाती है।   
 
अब ज्यादा से ज्यादा उपयोग में आनेवाला शब्द है ओके या प्लीज तो उसकी स्पेलिंग हो गई है केवल के या पी एल एस’. वायओयू (यू) के लिए सिर्फ यू’. डब्लूएचवाय’(व्हाय) के लिए केवल वाय’. अब आलम ये है, कि स्टूडंटस ऐसे स्पेलिंग परीक्षा में भी लिख रहे हैं. और मजबूरन स्पेलिंग के लिए मार्ग नहीं काटे ऐसा आदेश स्कूलों को अपने टीचर्स को देना पड़ रहा है।

नेट के जरीए तांत्रिक परिवर्तन अंग्रेजी भाषा को दुनिया के कोने कोने में फैला रहा है। हो सकता है आने वाले पचास सालों में हर मानव के हाथ में मोबाइल से भी उन्नत कोई कम्युनिकेशन का डिवाइस होगा। हर इंसान अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखता होगा। और शायद सौ साल बाद एक ही भाषा पूरे विश्व में होगी वह होगी अंग्रेजी।

यह सही है या गलत यह सोचने वाले हम कोई नहीं। क्योंकि यह एक स्वाभाविक और नैसर्गिक प्रक्रिया है। इसलिए स्पेलिंग पर हम ध्यान नहीं दे रहे हैं।

यह किताब शुरुआत से सीखने वालों के लिए हैं। जिनको शायद अंग्रेजी लिखना पढ़ना आता है, लेकिन बोलने में हिम्मत नहीं जुटा पाते ऐसे लोगों के लिए यह किताब बनाई गई है। जहाँ हमने बोलने के लिए नैसर्गिक तरीकों का उपयोग किया हुआ है।

यहाँ पर हमें यह भी पूछा गया कि क्या सिर्फ संवाद याद रखने से हम अंग्रेजी सीख पाएंगे? उसका उत्तर यकीनन “हाँ” है।

संवाद दो या अधिक लोगों में होता है आपको यह संवाद नाटकीय ढंग से दो या अधिक पात्रों में बांटना हैं और खुद के शब्द वाक्य जोड़कर इसे पढ़ना है जहाँ तक  
 
हो सके आप अपने डायलॉग खुद लिखे उसे याद करें और अपने से अच्छे जानकार आदमी का मार्गदर्शन ले।
 


No comments:

Post a Comment

1

Subscribe Us

Recent-post

Labels

Blog Archive

Facebook