Saturday, August 10, 2019

आध्यात्मिक स्वास्थ्य : विद्यार्थियों के लिए स्व- सम्मोहन से मन की एकाग्रता एवं प्रचण्ड स्मरणशक्ति (Hindi)


ग्रंथ श्रृंखला 2 -72
 
(यह किताब अंग्रेजी में भी उपलब्ध है।)








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धुनिक समाज में, आध्यात्मिक स्वास्थ्य यह विषय, शायद ही कभी चर्चा का विषय रहा है। विद्यार्थियोंके लिए स्व-सम्मोहन से मन की एकाग्रता एवं प्रचण्ड स्मरणशक्ति यह एक मात्र ऐसी किताब है जो बहुत कम उम्र में किसी भी इंसान को मन के विषय में जानकारी दे रही है।
हर एक विद्यार्थी, कितने गुण अर्जित कर पायेगा, मालूम नहीं।वो इंजीनियर, डाक्टर बन पायेगा मालूम नहीं है। 
किंतु इतना निश्चित है, एक दिन उसपर पारिवारिक जिम्मेदारी आएगी। वो बाप बनेगा या माँ बनेगी। बडे बुजुर्गोंको सम्भालेगा। आज का विद्यार्थी कल गृहस्थ गृहिणी होंगे। वो भी बूढे हो जाएंगे अपने बच्चोंको एक धरोहर देकर इस दुनिया से चले जाएंगे।
यह निरंतर चलनेवाले चक्र में हमने अपने विद्यार्थियोंको कितना बेहतरीन इंसान बनाया यह जरूरी है।
उसने जीवन का कितना आनंद उठाया यह जरूरी है। ज्ञान बेहद जरूरी है, जिसका बाय प्रोडक्ट गुण होते हैं।
प्राचीन भारतीय शिक्षण प्रणाली में स्पर्धा नहीं होती थी। हम परफोरमंस को ज्यादा महत्व देते थे।
यानी बच्चे को जिस विषय में रुची होती थी वह विषय बिना किसी रोक टोक के सिखाया जाता था। विद्यार्थी के स्मरणशक्ति को उतना महत्व नहीं दिया जाता था।
किंतु ब्रिटिश राज ने “क्रिश्चिअन” फिलोसोफी हमारे उपर जबरदस्ती लाद दी। जिसके कारण स्कूल के मित्र स्पर्धात्मक शत्रू में तब्दील हुए। स्पर्धा के कारण शिक्षक, माता पिता के हृदय से बच्चोंके प्रति प्रेम खत्म हुआ और वो केवल बाय हुक ओर क्रुक ' ज्यादा गुण लाने के लिए जुनूनी हो गए।
इतनी बडी शिक्षण प्रणाली जो केवल स्मरणशक्ति पर आधारित है,  कहीं पर भी स्मरणशक्ति मतलब क्या’ ,यह नहीं सिखाती। 
भावनाओंका प्रबंधन कैसे करते है, नहीं पढाती। इसलिए इस किताब का हमने आयोजन किया है जो विद्यार्थी के याद शक्ति को जानने में उनकी मदद करेगा। 
इतनी कम उम्र में आध्यात्मिक स्वास्थ्य के बारे में वो जानकारी लेंगे। 
पश्चिमी दार्शनिक, आध्यात्मिक स्वास्थ्य के बारे में बहुत कम जानते हैंजहां भारतीय दार्शनिकों ने 'आध्यात्मिक स्वास्थ्य' पर बहुत संशोधन किया है।
इस आधुनिक दुनिया में, मनुष्य रोगों पर शोध करने में व्यस्त हैं। हर कोई बीमारी पर काम कर रहा है। यही बात मनुष्यों के लिए एक खतरा है।

पुराने दिनों में, लोगों को स्वास्थ्य की चिंता थी, न कि बीमारियों की। इसलिए वे खुश थे, जीवन का आनंद ले रहे थे।
आध्यात्मिक गतिविधियाँ सभी के जीवन का अभिन्न अंग थीं। खाने की आदतें, भोजन, संगीत और कलाएँ सब कुछ आध्यात्मिकता से संबंधित था।

आधुनिक विश्व में केवल 10%  परिवार नियमित रूप से आध्यात्मिक गतिविधियाँ कर रहे हैं।
तथाकथितआधुनिक समाज आध्यात्मिक गतिविधि को पिछड़ेपन के प्रतीक के रूप में लेता है।
मनुष्य प्रकृति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है। वे जानवरों, सब्जियों, फसलों पर प्रयोग कर रहे हैं, बदले में मनुष्य को प्रदूषित वस्तुएँ ही मिल रही हैं।
प्रकृति को नियंत्रित करने के चक्कर में; पशुओं, सब्जियों, फसलों का स्वास्थ्य गिर गया है और स्थिति और जटिल हो गई है। एक विशाल रूप से, स्वास्थ्य की जगह बीमारियों ने ले ली है। इससे मामला ऐसा बिगड गया कि, अनेक बीमारियोंने  इंसान को पकड़ लिया।

शारीरिक बीमारी, मानसिक बीमारी आधुनिक मानव जीवन का अभिन्न अंग बन गई है।
जेट स्पीड के युग में, कोई भी एक सेकंड के लिए इंतजार करने के लिए तैयार नहीं है। रोगी तेजी से ठीक होने के लिए डॉक्टरों पर दबाव डालना शुरू कर देते हैं  और डॉक्टर दवा कंपनियों को रोगी को तेजी से ठीक करने के लिए, भले साइड इफेक्ट्स होते है, ड्रग्स बनाने के लिए कहते हैं।
मानव ने प्राकृतिक प्रणाली में अराजकता पैदा की है जिसके परिणामस्वरूप बीमारीयाँ पैदा  हुई है।
इसके अलावा, प्राकृतिक जल संसाधन, जैसे झील, नदी और समुद्र प्रदूषित कर दिये  हैं।
विकास के नाम पर, पहाड़ों और जंगलोंको मानव नष्ट कर रहा है।

वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण सब कुछ हमारे स्वास्थ्य को और भी गिरा रहा है।

बीमारी का एकमात्र उपाय स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करना है; शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ आध्यात्मिक स्वास्थ्य! 
आध्यात्मिक और धार्मिक दोनों अलग-अलग शब्दावली हैं।
आध्यात्मिक का मतलब धार्मिक नहीं है। धार्मिक गतिविधि का अर्थ आध्यात्मिक गतिविधि नहीं है।
आध्यात्मिक गतिविधि का अर्थ पैरा-मानसिक   गतिविधि भी नहीं है।

यह एक प्राचीन विज्ञान है, जो अद्भुत परिणाम देता है।
प्रत्येक मानव, जीवन में मानसिक   और आध्यात्मिक विकास एक लय में करता है।
आठवीं कक्षा तक, हम नास्तिक होते हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली हमें नास्तिक होना सिखाती है।
नौवी कक्षा के बाद,  हम किसी भी मंदिर या मस्जिद में, कम से कम एक बार, ’बोर्ड परीक्षा के कारण जाना शुरू करते हैं।
दसवीं कक्षा में, हम पचास प्रतिशत, आस्तिक हो जाते है। अच्छे अंक प्राप्त होते हैं। हमें विश्वास होता है कि हमारे पीछे कुछ "सर्वोच्च शक्ति" काम कर रही है। फिर भी अभी तक हम धार्मिक नहीं हैं।
एक दिन आप स्नातक बन जाते हैं,  और नौकरी ढूंढने के लिए निकल पडते हैंफिर से आप मंदिरों में जाना शुरू करते हैं। किसी तरह, आप रोजी रोटी कमाना शुरू करते हैं।
इस बीच, शादी के बाद माँ के घर को छोड़ कर, लडकियाँ ससुराल चली जाती है। भगवान पर ही निर्भर होती हैं। वे इस समय सबसे अधिक धार्मिक हो जाती हैं।  
 पुरुष अभी भी अपने करियर में कार्यरत हैं। कई लक्ष्य वो प्राप्त कर रहा हैं। वह इस बात से चिंतित नहीं है कि भगवान है भी या नहीं। क्योंकि वह खुद को, अपने परिवार का भगवान घोषित कर देता है। उसके बच्चे, पत्नी बूढ़े माता-पिता सभी उसकी दया पर हैं।
 
पैंतालीस से पचास की उम्र में, वह बीमार पड़ जाता है।
वह, पहली बार खुद के लिए किसी की मदद चाहता है। वह अपने अहंकार के कारण बच्चों, या पत्नी या बूढ़े माता-पिता द्वारा मानसिक सहायता नहीं माँग सकता। फिर भगवान की प्रार्थना करने का ही एकमात्र उपाय बचता है।
पचपन साल की उम्र के आसपास उनके चाचा, चाची, पिता या माता की मृत्यु हो जाती है। इस पल में, वह हिल जाता है। अब मृत्यु के बाद के जीवन का पता लगाना वह शुरू करता है। भिक्षुओं के बारेमें, मन की शांती, या धार्मिक गतिविधियों में उसे रुची होने लगती है।
फिर साठ के बाद, वह जीवन के अंत तक पूरी तरह से धार्मिक और आध्यात्मिक बनता है।
एक महिला पैंतालीस साल की उम्र के बाद अधिक
आध्यात्मिक हो जाती है । अपने जीवन को वो बेस्वाद होते देखती है।, क्योंकि वह अधिक एक्टिवेटेड नहीं है। नब्बे प्रतिशत महिलाएँ हार्मोनल परिवर्तनों के बाद संपूर्ण  धार्मिक बन जाती हैं।
आध्यात्मिक स्वास्थ्य की श्रृंखला में सम्मोहन और आत्म सम्मोहन सबसे ऊपर है। इसका कारण हमारा 98% स्वास्थ्य हमारी विचार शक्ति पर निर्भर करता है।

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